नवरात्र विशेष : दक्षिणांचल स्थित कोट की देवी मंदिर की महिमा अपार

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गोरखपुर-वाराणसी राजमार्ग पर मुख्यालय से लगभग 43किमी पर करवल ऊर्फ मझगावां में स्थित कोट की देवी का प्रसिद्ध मंदिर है.मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी मुराद पूरी हो जाती है.इसलिए दूर दूर से श्रद्धालु माता के दरबार में आकर पूजा अर्चना करते हैं.नवरात्र में नौ दिनों तक श्रद्धालुओ की बहुत भीड़ लगती है, भक्त जन यहां कड़ाही चढ़ाते हैं.अंतिम दिन बलि दिये जाने की प्रथा है, मंदिर पर पहुंचने के लिए अब पक्की सड़क का निर्माण हो चुका है.पिडि कि होती है विशेष आराधना, नवरात्र के अंतिम दिन बलि देने की है प्रथाबताया जाता है कि यहां पहले थारु जाति का निवास स्थान था बाद में थारु जाति ने अपना निवास स्थान बदल दिया जो घने जंगलों व झाड़-झंखाड़ के रुप में तब्दील हो गया.गोपालपुर स्टेट राजघराने से सम्बन्धित दो भाई मदन चन्द्र व कपूर चन्द्र यहां आ गये.कपूर चन्द्र जहां बसे वह स्थान करवल तथा मदन चन्द्र के निवास को मझगावां के नाम से जाना जाने लगा, वर्तमान समय में दोनों स्थानों को जोड़कर करवल मझगावां के नाम से जानते हैं.बताया जाता है कि मदन चन्द्र जहां निवास स्थान बना रहे थे वहां के झाड़ियों में खुदाई के दौरान एक पिंडी दिखी , मान्यता है कि करवल देवी की तीन बहनों मे से दुसरी कोट की देवी तथा तीसरी आजमगढ़ में परम ज्योति नाम से जानी जाती हैं.मदन चन्द्र ने पिंडी की पूजा अर्चना शुरू कर दी.सबसे अधिक ऊंचाई वाले स्थानपर पिंडी मिलने से कोट की देवी के नाम से प्रसिद्धि मिली,एक समय की बात है की मदन चन्द्र की दुसरी पिंढी के एक युवक घूमते घूमते नेपाल के राजघराने की कन्या की शादी के लिए रचाए जा रहे स्वंयवर में जा पहुंचे, इनके हाथ में लकड़ी के तलवार देख अन्य राजघरानों से आए राजपरिवार के लोग हंसने लगे.तब युवक ने अपनी पूज्यनीय कोट की देवी का स्मरण करने लगा, युवक के चेहरे व तलवार से अद्धभूत प्रकाश निकलने लगा,जिसे देख लोग काफी प्रभावित हो गये और राजा ने अपनी कन्या का विवाह युवक के साथ कर दिया.तभी से नवरात्रि के अंतिम दिन यहां लकड़ी के तलवार से बलि देने की प्रथा की शुरुआत हुई.वर्तमान समय में पिंडी के ऊपर मंदिर का निर्माण करवाया गया है. मंदिर में पिछले कई सालों से अनवरत दीपक जलता रहता है.वही मझगावां निवासी गुड्डू सिंह ने बताया कि पहले पूर्वज देवी को प्रसन्न करने के लिए बलि देते थे लेकिन विगत कई वर्षों से जायफर व नारियल से इनकी पूजा किया जा रहा है.लेकिन इधर दो वर्षों से मनोकामनाएं पूरी होने के बाद नवरात्र के दसमीं के दिन कोट के मन्दिर पहुंचकर बलि देते हैं.

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